तुम आओ तो सही मुझे आकर फिर से अपना बताओ तो सही में सह लुंगी सारे सितम ज़माने के तुम मुझे अपना बनाओ तो सही छू लो मुझे तुम साये की तरह लिपट जाओ मुझसे झुकी हुई शाख की तरह गले मेरी रूह को अपने लगाओ तो सही जिस्म जलता है कतरा कतरा करके बुझी राख़ से मुझे बनाओ तो सही भटकती रहती हूँ, रूह बनकर इस घर मै अपने जिस्म के घर में मुझे बसो तो सही साथ चल दो तुम, बस कदम दो कदम मंजिल की किसे फिक्र है तुम दीवारों को ही सही मेरा घर बनाओ तो सही खामोश तुम भी हो अक्सर खामोश मैं भी रह जाती हूँ आज चाँद लफ्जो से मेरे गीत को मेरे साथ गुनगुनाओ तो सही
आज कुछ शब्द खुद के लिए बो देना चाहती हूँ शायद कोई फूल, कोई शाख खिल उठे मेरे लिए जानती हूँ, उगा रही हूँ, बंजर जमीन पर उगेगा तो क्या अंकुरित भी नहीं हो पायेगा लेकिन अपने तसल्ली के लिए उगा लेना चाहती हूँ अपने खबाब के बंजर जमीन पर कुछ शब्द अपने लिए जिन्हें आज तक बोया तो बहुत बार लेकिन काटने की रुत आने से पहले ही मुरझा जाते हैं शायद मेरे आँखों का पानी कम हो गया उन्हें सींचने के लिए चलो फिर से कोई घाव दे दो मुझे ताकि नयनों का नीर सूखने न पाए मेरे शब्दों का पौधा मुरझाने न पाए............
Posted by Neelam at 4:11 AM 38 comments Links to this post Friday, June 25, 2010
Arizona Sunset
Posted by Neelam at 3:42 AM 3 comments Links to this post Thursday, June 17, 2010
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ReplyDeleteतुम आओ तो सही
ReplyDeleteमुझे आकर फिर से अपना बताओ तो सही
में सह लुंगी सारे सितम ज़माने के
तुम मुझे अपना बनाओ तो सही
छू लो मुझे तुम साये की तरह
लिपट जाओ मुझसे झुकी हुई शाख की तरह
गले मेरी रूह को अपने लगाओ तो सही
जिस्म जलता है कतरा कतरा करके
बुझी राख़ से मुझे बनाओ तो सही
भटकती रहती हूँ, रूह बनकर इस घर मै
अपने जिस्म के घर में मुझे बसो तो सही
साथ चल दो तुम, बस कदम दो कदम
मंजिल की किसे फिक्र है
तुम दीवारों को ही सही
मेरा घर बनाओ तो सही
खामोश तुम भी हो
अक्सर खामोश मैं भी रह जाती हूँ
आज चाँद लफ्जो से मेरे गीत को
मेरे साथ गुनगुनाओ तो सही
आज कुछ शब्द खुद के लिए बो देना चाहती हूँ
ReplyDeleteशायद कोई फूल, कोई शाख खिल उठे मेरे लिए
जानती हूँ,
उगा रही हूँ, बंजर जमीन पर
उगेगा तो क्या अंकुरित भी नहीं हो पायेगा
लेकिन अपने तसल्ली के लिए उगा लेना चाहती हूँ
अपने खबाब के बंजर जमीन पर
कुछ शब्द अपने लिए
जिन्हें आज तक बोया तो बहुत बार
लेकिन काटने की रुत आने से पहले ही मुरझा जाते हैं
शायद मेरे आँखों का पानी कम हो गया
उन्हें सींचने के लिए
चलो फिर से कोई घाव दे दो मुझे
ताकि नयनों का नीर सूखने न पाए
मेरे शब्दों का पौधा मुरझाने न पाए............
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